लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे प्रभो! सुननेमें कठोर परन्तु [परिणाममें] परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं, वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं। नीति सुनिये, [उसके अनुसार] पहले दूत भेजिये, और [फिर] सीताको देकर श्रीरामजीसे प्रीति [मेल] कर लीजिये॥ ५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 780 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।।
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती।।
स्रोत अभिलेख 6.9 · पुस्तक पृ. 780, 780
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।।
English explanation
But, lord, few are those who listen to and speak words that are deeply beneficial yet harsh to hear.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बचन | बातें | words |
| परम | अत्यंत | supremely |
| हित | हितकारी | beneficial |
| सुनत | सुनने में | to hear |
| कठोरे | कठोर | harsh |
| सुनहिं | सुनते हैं | listen |
| जे | जो लोग | those who |
| कहहिं | कहते हैं | speak |
| ते | वे | those |
| नर | लोग | people |
| प्रभु | हे स्वामी | O lord |
| थोरे | थोड़े | few |
2 प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती।।
English explanation
Hear this prudent counsel: first send an envoy, return Sita, and then establish friendship.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रथम | पहले | first |
| बसीठ | दूत | an envoy |
| पठउ | भेजो | send |
| सुनु | सुनो | listen |
| नीती | नीति; उचित सलाह | prudent counsel |
| सीता | सीता, राम की पत्नी | Sita, Rama’s wife |
| देइ | देकर; लौटाकर | having returned |
| करहु | करो | establish |
| पुनि | फिर | then |
| प्रीती | मैत्री | friendship |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.9
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 780
- सहायक विषय
- रावणको मन्दोदरीका समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 780, 780
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