लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दवे सब [वैर-विरोध भूलकर] प्रभुके दर्शन कर रहे हैं, हटानेसे भी नहीं हटते। सबके मन हर्षित हैं; सब सुखी हो गये। उनकी आड़के कारण जल नहीं दिखायी पड़ता। वे सब भगवान्का रूप देखकर [आनन्द और प्रेममें] मग्र हो गये॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 776 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे।।
तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी।।
स्रोत अभिलेख 6.4 · पुस्तक पृ. 775, 776
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे।।
English explanation
They gaze at the Lord and do not move away even when urged aside. All became joyful at heart and happy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभुहि | प्रभु राम को | the Lord Rama |
| बिलोकहिं | निहारते हैं | gaze at |
| टरहिं | हटते हैं | move away |
| न | नहीं | not |
| टारे | हटाए जाने पर भी | even when urged aside |
| मन | मन से | at heart |
| हरषित | प्रसन्न | joyful |
| सब | सभी | all |
| भए | हो गए | became |
| सुखारे | सुखी | happy |
2 तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी।।
English explanation
The water cannot be seen behind those aquatic creatures. Beholding Hari’s form, they became absorbed in joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तिन्ह | उन जलजीवों | those aquatic creatures |
| की | की | of |
| ओट | आड़ में | behind the covering |
| न | नहीं | not |
| देखिअ | दिखाई देता | can be seen |
| बारी | जल | water |
| मगन | आनंद में मग्न | absorbed in joy |
| भए | हो गए | became |
| हरि | हरि अर्थात राम का | of Hari, here Rama |
| रूप | रूप | form |
| निहारी | देखकर | having beheld |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 776
- सहायक विषय
- नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना
- मुद्रित पृष्ठ
- 775, 776
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।