लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दफिर कृपालु श्रीरामजीने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत ही अग्निबाण चलाया, जिससे प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रह गया। जैसे ज्ञानके उदय होनेपर [सब प्रकारके] सन्देह दूर हो जाते हैं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 818 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा।।
भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं।।
स्रोत अभिलेख 6.47 · पुस्तक पृ. 817, 818
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा।।
English explanation
Then compassionate Rama smiled, readied his bow, and immediately shot a fire arrow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then |
| कृपाल | कृपालु राम | compassionate Rama |
| हँसि | हँसकर; मुसकराकर | smiling |
| चाप | धनुष | bow |
| चढ़ावा | चढ़ाया; प्रयोग के लिए तैयार किया | readied for shooting |
| पावक | अग्नि; अग्निमय | fire; fiery |
| सायक | बाण | arrow |
| सपदि | तुरंत | immediately |
| चलावा | चलाया | shot |
2 भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं।।
English explanation
Light appeared, leaving no darkness anywhere, just as doubts vanish when knowledge dawns.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भयउ | हो गया | came to be |
| प्रकास | प्रकाश | light |
| कतहुँ | कहीं भी | anywhere |
| तम | अंधकार | darkness |
| नाहीं | नहीं रहा | was no longer present |
| ग्यान | ज्ञान | knowledge |
| उदयँ | उदय होने पर | upon the dawning of |
| जिमि | जैसे | just as |
| संसय | संशय | doubts |
| जाहीं | दूर हो जाते हैं | vanish |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.47
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 818
- सहायक विषय
- युद्धारम्भ
- मुद्रित पृष्ठ
- 817, 818
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।