लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दशत्रुको पराजित न होता देखकर वानर डरे। तब सर्पराज शेषजी (लक्ष्मणजी) बहुत ही क्रोधित हुए। लक्ष्मणजीने मनमें यह विचार दृढ़ किया कि इस पापीको मैं बहुत खेला चुका [अब और अधिक खेलाना अच्छा नहीं, अब तो इसे समाप्त ही कर देना चाहिये।]॥ ७॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 846 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा।।
लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा।।
स्रोत अभिलेख 6.76 · पुस्तक पृ. 845, 847
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा।।
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2 लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा।।
इस पंक्ति का अर्थ अभी उपलब्ध नहीं है।
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.76
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 846
- सहायक विषय
- मेघनाद-यज्ञ-विध्वंस, युद्ध और मेघनाद-उद्धार
- मुद्रित पृष्ठ
- 845, 847
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