लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दउधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं जिस प्रकार अपने ही मुखसे कहनेपर पुण्य घट जाते हैं। रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई (कुम्भकर्ण) का सिर कलेजेसे लगाता है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 841 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती।।
बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई।।
स्रोत अभिलेख 6.72 · पुस्तक पृ. 841, 842
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती।।
English explanation
The demons dwindle day and night, just as merit diminishes when one proclaims it oneself.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| छीजहिं | क्षीण होते जाते हैं | keep dwindling |
| निसिचर | राक्षस | demons |
| दिनु | दिन | day |
| अरु | और | and |
| राती | रात | night |
| निज | अपने | one’s own |
| मुख | मुख से | with one’s mouth |
| कहें | कहने पर | when proclaimed |
| सुकृत | पुण्य | merit from good deeds |
| जेहि | जिस | in which |
| भाँती | प्रकार | manner |
2 बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई।।
English explanation
Ravana laments deeply and repeatedly holds his brother’s head against his chest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बहु | बहुत | greatly |
| बिलाप | विलाप | lamentation |
| दसकंधर | दस सिर वाला रावण | ten-headed Ravana |
| करई | करता है | does |
| बंधु | भाई कुंभकर्ण का | of his brother Kumbhakarna |
| सीस | सिर | head |
| पुनि | फिर | again |
| पुनि | फिर | again |
| उर | छाती पर | against his chest |
| धरई | रखता है | holds |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.72
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 841
- सहायक विषय
- कुम्भकर्ण-युद्ध और उसकी परमगति
- मुद्रित पृष्ठ
- 841, 842
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।