लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी।।
मूल पाठ
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी।।
काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू।।
स्रोत अभिलेख 6.44 · पुस्तक पृ. 815, 815
भावार्थ
मूल पाठ के बादवे गर्जकर शत्रुकी सेनाके बीचमें कूद पड़े और अपने भारी भुजबलसे उसका मर्दन करने लगे। किसीकी लातसे और किसीकी थप्पड़से खबर लेते हैं [और कहते हैं कि] तुम श्रीरामजीको नहीं भजते, उसका यह फल लो॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 815 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी।।
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2 काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.44
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 815
- सहायक विषय
- युद्धारम्भ
- मुद्रित पृष्ठ
- 815, 815
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