लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं।।
मूल पाठ
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं।।
पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा।।
स्रोत अभिलेख 6.44 · पुस्तक पृ. 815, 815
भावार्थ
मूल पाठ के बादवानरलीला करके (घुड़की देकर) दोनों उनको डराते हैं और श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश सुनाते हैं। फिर सोनेके खंभोंको हाथोंसे पकड़कर उन्होंने [परस्पर] कहा कि अब उत्पात आरम्भ किया जाय॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 815 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
शब्दार्थ उपलब्ध नहींइस पद के शब्दार्थ अभी उपलब्ध नहीं हैं। ऊपर का भावार्थ और मूल पाठ पढ़ें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं।।
इस पंक्ति का अर्थ अभी उपलब्ध नहीं है।
2 पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा।।
इस पंक्ति का अर्थ अभी उपलब्ध नहीं है।
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.44
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 815
- सहायक विषय
- युद्धारम्भ
- मुद्रित पृष्ठ
- 815, 815
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।