लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दकाटे हुए सिर आकाशमार्गसे दौड़ते हैं और जय-जयकी ध्वनि करके भय उत्पन्न करते हैं। 'लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं?॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 867 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं।।
कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा।।
स्रोत अभिलेख 6.93 · पुस्तक पृ. 866, 867
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं।।
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2 कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.93
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 867
- सहायक विषय
- इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, राम-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 866, 867
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