बालकाण्ड · सोरठा 183 · सोरठा
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥ १८३॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.183 · पुस्तक पृ. 183, 184
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
राक्षस जो घोर अन्याय करते हैं, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
English explanation
The dreadful injustices committed by the demons cannot be described.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरनि | वर्णन किया | described |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकता | can be |
| अनीति | अन्याय; नीति-विरुद्ध कर्म | injustice; wrongful conduct |
| घोर | भयानक | dreadful |
| निसाचर | राक्षस; रात में विचरण करने वाले | demons; night-roamers |
| जो | जो; जिस अन्याय को | which; referring to the injustices |
| करहिं | करते हैं | they commit |
2हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥ १८३॥
उन्हें हिंसा से अत्यधिक प्रेम है; उनके पापों की भला क्या सीमा है?
English explanation
They delight greatly in violence; what limit could there be to their sins?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हिंसा | हिंसा; प्राणियों को चोट पहुँचाना | violence; harming living beings |
| पर | के प्रति | toward; for |
| अति | बहुत अधिक | exceedingly |
| प्रीति | प्रेम; लगाव | love; fondness |
| तिन्ह | उन राक्षसों | those demons |
| के | के | of; belonging to |
| पापहि | पापों की | of their sins |
| कवनि | क्या; कौन-सी | what |
| मिति | सीमा; परिमाण | limit; measure |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- सोरठा 183
- स्रोत अभिलेख
- 1.183
- सहायक विषय
- रावणादिका जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार
- मुद्रित पृष्ठ
- 183, 184
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