बालकाण्ड · सोरठा 5 · सोरठा
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥५॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 17, 19
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
मैं करुणा के समुद्र, मानव रूप में हरि, गुरु के चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ।
English explanation
I bow to the lotus feet of the guru, an ocean of compassion and Hari in human form.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बंदउँ | मैं प्रणाम करता हूँ | I bow to |
| गुरु | गुरु के | of the guru |
| पद | चरण | feet |
| कंज | कमल | lotuses |
| कृपा | करुणा के | of compassion |
| सिंधु | समुद्र | ocean |
| नररूप | मानव रूप में | in human form |
| हरि | भगवान हरि | Lord Hari |
2महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥५॥
जिनके वचन महामोह के घने अंधकार के लिए सूर्य की किरणों का समूह हैं।
English explanation
Whose words are a host of sunbeams against the dense darkness of profound delusion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| महामोह | गहरे मोह का | of profound delusion |
| तम | अंधकार | darkness |
| पुंज | घना समूह | dense mass |
| जासु | जिनके | whose |
| बचन | वचन | words |
| रबि | सूर्य की | of the sun |
| कर | किरणें | rays |
| निकर | समूह | a host |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- सोरठा 5
- स्रोत अभिलेख
- मंगलाचरण
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 17, 19
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