बालकाण्ड · श्लोक · श्लोक
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
मूल पाठ
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥३॥
स्रोत अभिलेख मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 17, 19
भावार्थ
मूल पाठ के बादज्ञानमय, नित्य, शङ्कररूपी गुरुकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होनेसे ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 17 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
English explanation
I bow to the guru, the embodiment of knowledge, eternal and in the form of Shankara.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| वन्दे | मैं प्रणाम करता हूँ | I bow to |
| बोधमयं | ज्ञानस्वरूप | embodying knowledge |
| नित्यं | नित्य, शाश्वत | eternal |
| गुरुं | गुरु को | to the guru |
| शङ्कररूपिणम् | शिव के स्वरूप वाले | in the form of Shiva |
2यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥३॥
English explanation
By taking refuge in whom, even the curved moon is indeed honoured everywhere.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| यमाश्रितो | जिनका आश्रय लिया हुआ | having taken refuge in whom |
| हि | निश्चय ही | indeed |
| वक्रोऽपि | टेढ़ा होने पर भी | even though curved |
| चन्द्रः | चंद्रमा | the moon |
| सर्वत्र | हर जगह | everywhere |
| वन्द्यते | वंदित होता है | is honoured |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- श्लोक
- स्रोत अभिलेख
- मंगलाचरण
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 17
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 17, 19
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