बालकाण्ड · दोहा 305 · दोहा/सोरठा
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल।।305।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.305 · पुस्तक पृ. 287, 288
भावार्थ और शब्दार्थ
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1हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
परस्पर मिलने के लिए आनंदित होकर कुछ लोग घोड़ों को सरपट दौड़ाते हुए आगे बढ़े।
English explanation
Eager and joyful to meet one another, some rode forward at a gallop.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हरषि | आनंदित होकर | joyfully |
| परसपर | एक-दूसरे से | one another |
| मिलन | मिलने | to meet |
| हित | के लिए | for the purpose of |
| कछुक | कुछ लोग | some people |
| चले | आगे चले | advanced |
| बगमेल | घोड़े सरपट दौड़ाते हुए | riding at a gallop |
2 जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल।।305।।
मानो आनंद के दो समुद्र अपनी तट-सीमाएँ छोड़कर आपस में मिल रहे हों।
English explanation
It was as though two oceans of joy were leaving their shores behind and merging.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जनु | मानो | as though |
| आनंद | आनंद के | of joy |
| समुद्र | समुद्र | oceans |
| दुइ | दो | two |
| मिलत | मिल रहे हों | were merging |
| बिहाइ | छोड़कर | leaving behind |
| सुबेल | अपनी तट-सीमाएँ | their shores or bounds |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 305
- स्रोत अभिलेख
- 1.305
- सहायक विषय
- दशरथजीके पास जनकजीका दूत भेजना, अयोध्यासे बारातका प्रस्थान
- मुद्रित पृष्ठ
- 287, 288
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