बालकाण्ड · दोहा 185 · दोहा/सोरठा
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर।।185।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.185 · पुस्तक पृ. 186, 186
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
सुनकर ब्रह्मा के मन में हर्ष हुआ, शरीर पुलकित हो उठा और आँखों से आँसू बहने लगे।
English explanation
On hearing this, Brahma’s heart rejoiced, his body thrilled, and tears flowed from his eyes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | on hearing |
| बिरंचि | ब्रह्मा के | Brahma’s |
| मन | मन में | in the heart |
| हरष | हर्ष हुआ | joy arose |
| तन | शरीर | body |
| पुलकि | पुलकित हुआ | thrilled with goosebumps |
| नयन | आँखों से | from the eyes |
| बह | बहा | flowed |
| नीर | आँसू | tears |
2 अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर।।185।।
हाथ जोड़कर, सावधान और स्थिर बुद्धि होकर ब्रह्मा स्तुति करने लगे।
English explanation
With hands joined, attentive and steady in mind, Brahma began offering praise.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस्तुति | स्तुति | praise |
| करत | करते हैं | offers |
| जोरि | जोड़कर | having joined |
| कर | हाथ | hands |
| सावधान | एकाग्र और सजग | attentive and focused |
| मतिधीर | स्थिर बुद्धिवाले | steady in mind |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 185
- स्रोत अभिलेख
- 1.185
- सहायक विषय
- पृथ्वी और देवतादिकी करुण पुकार
- मुद्रित पृष्ठ
- 186, 186
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