बालकाण्ड · दोहा 230 · दोहा/सोरठा
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि।।230।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.23 · पुस्तक पृ. 225, 226
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।
सीता की शोभा का मन में वर्णन करके और अपनी दशा पर विचार करके प्रभु राम—
English explanation
Having described Sita’s beauty inwardly and considered his own state, Lord Rama—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिय | सीता की | Sita’s |
| सोभा | शोभा | beauty |
| हियँ | हृदय में | in his heart |
| बरनि | वर्णन करके | having described |
| प्रभु | प्रभु राम | Lord Rama |
| आपनि | अपनी | his own |
| दसा | दशा, मन की स्थिति | state of mind |
| बिचारि | विचार करके | having considered |
2 बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि।।230।।
—पवित्र मन से अपने छोटे भाई लक्ष्मण को अवसर के अनुरूप वचन बोले।
English explanation
—with a pure mind, spoke words fitting the occasion to his younger brother Lakshmana.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बोले | बोले | spoke |
| सुचि | पवित्र | pure |
| मन | मन से | with a mind |
| अनुज | छोटे भाई लक्ष्मण | his younger brother Lakshmana |
| सन | से | to |
| बचन | वचन | words |
| समय | अवसर | the occasion |
| अनुहारि | के अनुरूप | in keeping with |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 230
- स्रोत अभिलेख
- 1.23
- सहायक विषय
- पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजीका प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीका परस्पर दर्शन
- मुद्रित पृष्ठ
- 225, 226
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