बालकाण्ड · दोहा 105 · दोहा/सोरठा
सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद।
सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद।
बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद।।105।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.105 · पुस्तक पृ. 119, 120
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद।
सिद्ध, तपस्या को धन मानने वाले तपस्वी, योगी, देवता, किन्नर और मुनियों के समूह—
English explanation
Perfected beings, ascetics rich in austerity, yogis, gods, celestial kinnaras, and hosts of sages—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिद्ध | सिद्धि प्राप्त साधक | spiritually perfected beings |
| तपोधन | तपस्या ही जिनका धन है ऐसे तपस्वी | ascetics whose wealth is austerity |
| जोगिजन | योगीजन | practitioners of yoga |
| सूर | देवता | gods |
| किंनर | किन्नर; एक प्रकार के दिव्य गायक | kinnaras, a class of celestial musicians |
| मुनिबृंद | मुनियों के समूह | hosts of sages |
2 बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद।।105।।
ये सभी पुण्यात्मा वहाँ रहते हैं और सुख के मूल स्रोत शिव की सेवा करते हैं।
English explanation
All these virtuous beings dwell there and serve Shiva, the source of bliss.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बसहिं | रहते हैं | dwell |
| तहाँ | वहाँ | there |
| सुकृती | पुण्यात्मा; शुभ कर्म करने वाले | virtuous beings |
| सकल | सभी | all |
| सेवहिं | सेवा करते हैं | serve |
| सिब | भगवान शिव की | Lord Shiva |
| सुखकंद | सुख के मूल स्रोत | the root source of bliss |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 105
- स्रोत अभिलेख
- 1.105
- सहायक विषय
- शिवजीका विवाह
- मुद्रित पृष्ठ
- 119, 120
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