बालकाण्ड · दोहा 14 (क) · दोहा/सोरठा
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.14 · पुस्तक पृ. 35, 37
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सुज्ञानी उसी सरल कविता और निर्मल कीर्ति का आदर करते हैं—
English explanation
The discerning esteem that simple poetry and spotless renown—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सरल | सरल; सहज | simple; accessible |
| कबित | कविता | poetry |
| कीरति | कीर्ति | renown |
| बिमल | निर्मल | spotless; pure |
| सोइ | उसी को | that |
| आदरहिं | आदर करते हैं | esteem |
| सुजान | सुज्ञानी लोग | discerning people |
2 सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।।
जिसे सुनकर शत्रु भी अपना स्वाभाविक वैर भूलकर प्रशंसा करते हैं।
English explanation
Which even enemies praise on hearing it, forgetting their natural hostility.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहज | स्वाभाविक | natural; ingrained |
| बयर | वैर | hostility |
| बिसराइ | भूलकर | forgetting |
| रिपु | शत्रु | enemies |
| जो | जिसे | which |
| सुनि | सुनकर | on hearing |
| करहिं | करते हैं | offer |
| बखान | प्रशंसा | praise |
| क | पद्य-संदर्भ चिह्न (क) | verse reference marker (क) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 14 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 1.14
- सहायक विषय
- कवि-वन्दना · वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदिकी वन्दना
- मुद्रित पृष्ठ
- 35, 37
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