बालकाण्ड · दोहा 270 · दोहा/सोरठा
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।270।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.27 · पुस्तक पृ. 259, 260
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
श्रीराम ने सभी लोगों को भयभीत देखा और जानकी को भी डरी हुई जाना।
English explanation
Rama saw everyone afraid and recognized that Sita too was frightened.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सभय | भयभीत | afraid |
| बिलोके | देखा | observed |
| लोग | लोगों को | the people |
| सब | सभी | all |
| जानि | जानकर | recognizing; knowing |
| जानकी | जनक की पुत्री सीता को | Sita, Janaka's daughter |
| भीरु | डरी हुई | frightened |
2 हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।270।।
हृदय में न हर्ष था, न कोई विषाद; श्रीराम बोले।
English explanation
With neither joy nor sorrow in his heart, Rama spoke.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हृदयँ | हृदय में | in his heart |
| न | न; नहीं | neither; not |
| हरषु | हर्ष; प्रसन्नता | joy |
| बिषादु | विषाद; दुःख | sorrow |
| कछु | कुछ भी | any; at all |
| बोले | बोले | spoke |
| श्रीरघुबीरु | श्रीराम, रघुवंश के वीर | Rama, the hero of Raghu's lineage |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 270
- स्रोत अभिलेख
- 1.27
- सहायक विषय
- जयमाल पहनाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 259, 260
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