बालकाण्ड · दोहा 58 · दोहा/सोरठा
सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं।।58।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.58 · पुस्तक पृ. 78, 79
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
तब सती कैलास में रहती थीं, और उनके मन में बहुत शोक था।
English explanation
Sati then lived on Kailasa, with great sorrow in her mind.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सती | सती; शिव की पत्नी | Sati, Shiva's wife |
| बसहि | रहती थीं | dwelt; lived |
| कैलास | कैलास पर्वत पर | on Mount Kailasa |
| तब | उस समय | then |
| अधिक | बहुत | great; much |
| सोचु | शोक; चिंता | sorrow; anxiety |
| मन | मन | mind |
| माहिं | में | in |
2 मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं।।58।।
उनके दुःख का रहस्य कोई कुछ भी नहीं जानता था; उनके दिन युगों जैसे बीतते थे।
English explanation
No one knew anything of her hidden anguish; her days passed like ages.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मरमु | भीतरी रहस्य; दुःख का मर्म | inner secret; hidden anguish |
| न | नहीं | not |
| कोऊ | कोई | anyone |
| जान | जानता है | knows |
| कछु | कुछ भी | anything |
| जुग | युग | an age; an aeon |
| सम | के समान | like |
| दिवस | दिन | days |
| सिराहिं | बीतते हैं | pass |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 58
- स्रोत अभिलेख
- 1.58
- सहायक विषय
- शिवजीद्वारा सतीका त्याग, शिवजीकी समाधि
- मुद्रित पृष्ठ
- 78, 79
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