बालकाण्ड · दोहा 137 · दोहा/सोरठा
श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।
श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।137।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.137 · पुस्तक पृ. 146, 146
भावार्थ और शब्दार्थ
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1श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।
शाप को सिर पर स्वीकार करके, हृदय में प्रसन्न होते हुए, प्रभु ने बहुत विनती की।
English explanation
Accepting the curse upon his head and rejoicing inwardly, the Lord made many entreaties.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| श्राप | शाप को | the curse |
| सीस | सिर पर | upon his head |
| धरी | रखकर; स्वीकार करके | having placed; having accepted |
| हरषि | प्रसन्न होकर | rejoicing |
| हियँ | हृदय में | in his heart |
| प्रभु | भगवान विष्णु ने | Lord Vishnu |
| बहु | बहुत | many |
| बिनती | विनती | entreaties |
| कीन्हि | की | made |
2 निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।137।।
कृपा के भंडार प्रभु ने अपनी माया का प्रबल प्रभाव वापस खींच लिया।
English explanation
The Lord, the treasury of compassion, withdrew the powerful influence of his own illusion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपनी | his own |
| माया | माया; मोह उत्पन्न करने वाली शक्ति | illusion; deluding power |
| कै | की | of |
| प्रबलता | प्रबल प्रभाव | powerful influence |
| करषि | खींचकर; वापस समेटकर | drawing back; withdrawing |
| कृपानिधि | कृपा के भंडार भगवान | the Lord, treasury of compassion |
| लीन्हि | ले लिया | took back |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 137
- स्रोत अभिलेख
- 1.137
- सहायक विषय
- विश्वमोहिनीका स्वयंवर, शिवगणोंको तथा भगवान्को शाप और नारदका मोह-भंग
- मुद्रित पृष्ठ
- 146, 146
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