बालकाण्ड · दोहा 138 · दोहा/सोरठा
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।।
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।।
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान।।138।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.138 · पुस्तक पृ. 147, 147
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।।
मुनि को अनेक प्रकार से समझाकर प्रभु तब अंतर्धान हो गए।
English explanation
After instructing and reassuring the sage in many ways, the Lord disappeared.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बहुबिधि | अनेक प्रकार से | in many ways |
| मुनिहि | मुनि को | the sage |
| प्रबोधि | समझाकर | having instructed and reassured |
| प्रभु | भगवान विष्णु | Lord Vishnu |
| तब | तब | then |
| भए | हो गए | became |
| अंतरधान | अदृश्य | invisible |
2 सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान।।138।।
नारद राम के गुणों का गान करते हुए सत्यलोक को चले।
English explanation
Narada departed for Satyaloka, singing Rama’s virtues.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सत्यलोक | ब्रह्मा के लोक को | to Brahma’s realm, Satyaloka |
| नारद | देवर्षि नारद | Narada, the divine sage |
| चले | चले | departed |
| करत | करते हुए | while performing |
| राम | भगवान राम के | of Lord Rama |
| गुन | गुणों का | virtues |
| गान | गान | singing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 138
- स्रोत अभिलेख
- 1.138
- सहायक विषय
- विश्वमोहिनीका स्वयंवर, शिवगणोंको तथा भगवान्को शाप और नारदका मोह-भंग
- मुद्रित पृष्ठ
- 147, 147
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