बालकाण्ड · दोहा 145 · दोहा/सोरठा
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।
बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात।।145।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.145 · पुस्तक पृ. 152, 153
भावार्थ और शब्दार्थ
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1श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।
कानों के लिए अमृत समान वचन सुनकर उनके शरीर रोमांचित और आनंद से प्रफुल्लित हो उठे।
English explanation
Hearing words like nectar to the ears, their bodies thrilled with goosebumps and blossomed with joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| श्रवन | कानों के लिए | to the ears |
| सुधा | अमृत | nectar |
| सम | समान | like |
| बचन | वचन | words |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| पुलक | रोमांच से युक्त | with goosebumps |
| प्रफुल्लित | आनंद से खिले हुए | blossoming with joy |
| गात | शरीर | bodies |
2 बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात।।145।।
दंडवत प्रणाम करके मनु बोले; प्रेम उनके हृदय में समा नहीं रहा था।
English explanation
Manu spoke after prostrating himself; his heart could not contain his love.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बोले | बोले | spoke |
| मनु | राजा मनु | King Manu |
| करि | करके | having performed |
| दंडवत | पूर्ण शरीर से भूमि पर प्रणाम | full prostration |
| प्रेम | प्रेम | love |
| न | नहीं | not |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| समात | समाता था | could be contained |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 145
- स्रोत अभिलेख
- 1.145
- सहायक विषय
- मनु-शतरूपा-तप एवं वरदान
- मुद्रित पृष्ठ
- 152, 153
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