बालकाण्ड · दोहा 272 · दोहा/सोरठा
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.272 · पुस्तक पृ. 261, 261
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
“हे राजकुमार, अपने माता-पिता को शोक के वश में मत कर।”
English explanation
“O young prince, do not plunge your mother and father into grief.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मातु | माता को | your mother |
| पितहि | पिता को | your father |
| जनि | मत | do not |
| सोचबस | शोक के वश में | overcome by grief |
| करसि | तू कर | you make |
| महीसकिसोर | हे युवा राजकुमार | O young prince |
2 गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।।
“मेरा फरसा अत्यंत भयानक है; वह गर्भों के शिशुओं का भी संहार करने वाला है।”
English explanation
“My axe is exceedingly terrible, a destroyer even of infants in the womb.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गर्भन्ह | गर्भों | wombs |
| के | के | of |
| अर्भक | शिशुओं | infants |
| दलन | संहार करने वाला | destroyer of |
| परसु | फरसा | axe |
| मोर | मेरा | my |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| घोर | भयानक | terrible |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 272
- स्रोत अभिलेख
- 1.272
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 261, 261
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