बालकाण्ड · दोहा 273 · दोहा/सोरठा
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर।।273।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.273 · पुस्तक पृ. 262, 262
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
हे धीर महामुनि! आपके शस्त्र देखकर मैंने जो अनुचित कहा हो, उसे क्षमा करें।
English explanation
O steadfast great sage, forgive whatever improper words I spoke on seeing your weapons.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जो | जो कुछ | whatever |
| बिलोकि | देखकर | on seeing |
| अनुचित | अनुचित बात | something improper |
| कहेउँ | मैंने कहा | I said |
| छमहु | आप क्षमा करें | please forgive |
| महामुनि | हे महान मुनि! | O great sage! |
| धीर | धैर्यवान | steadfast |
2 सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर।।273।।
यह सुनकर भृगुवंश के रत्न परशुराम क्रोध सहित गंभीर वाणी में बोले।
English explanation
Hearing this, Parashurama, the jewel of Bhrigu’s lineage, spoke angrily in a deep, grave voice.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| सरोष | क्रोध सहित | with anger |
| भृगुबंसमनि | भृगुवंश के रत्न परशुराम | Parashurama, jewel of Bhrigu’s lineage |
| बोले | बोले | spoke |
| गिरा | वाणी में | in a voice |
| गभीर | गंभीर | deep and grave |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 273
- स्रोत अभिलेख
- 1.273
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 262, 262
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