बालकाण्ड · दोहा 3 (क) · दोहा/सोरठा
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ।।3(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.3 · पुस्तक पृ. 21, 23
भावार्थ और शब्दार्थ
1बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
मैं उन संतों को प्रणाम करता हूँ जिनका चित्त सबके प्रति समान है और जिनके लिए कोई मित्र या शत्रु नहीं है।
English explanation
I bow to saints whose minds regard everyone equally, for whom no one is a friend or an enemy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बंदउँ | मैं प्रणाम करता हूँ | I bow to |
| संत | संतों को | saints |
| समान | समभाव वाला | impartial; equal toward all |
| चित | चित्त | mind; heart |
| हित | हितैषी; मित्र | well-wisher; friend |
| अनहित | अहितैषी; शत्रु | ill-wisher; enemy |
| नहिं | नहीं | not |
| कोइ | कोई | anyone |
2 अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ।।3(क)।।
वे अंजलि में रखे सुंदर फूल के समान हैं, जो दोनों हाथों को एक-सी सुगंध देता है।
English explanation
They are like a lovely flower held in cupped hands, giving equal fragrance to both hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अंजलि | जुड़े हुए दोनों हाथों में | in cupped hands |
| गत | स्थित; रखा हुआ | placed; held |
| सुभ | सुंदर; शुभ | lovely; auspicious |
| सुमन | फूल | flower |
| जिमि | जैसे | like |
| सम | समान | equal |
| सुगंध | सुगंध | fragrance |
| कर | हाथों को | to the hands |
| दोइ | दोनों | both |
| क | दोहा ३ के भाग (क) का संदर्भ-चिह्न | reference marker for part (a) of verse 3 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 3 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 1.3
- सहायक विषय
- ब्राह्मण-संत-वन्दना
- मुद्रित पृष्ठ
- 21, 23
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।