बालकाण्ड · दोहा 258 · दोहा/सोरठा
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।
खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल।।258।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.258 · पुस्तक पृ. 249, 250
भावार्थ और शब्दार्थ
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1प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।
सीता प्रभु राम को देखती हैं, फिर धरती की ओर देखती हैं; उनके चंचल नेत्र शोभित हैं।
English explanation
Sita looks at Lord Rama, then looks toward the ground; her restless eyes shine beautifully.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभुहि | प्रभु राम को | Lord Rama |
| चितइ | देखती हैं | looks at |
| पुनि | फिर | then |
| चितव | देखती हैं | looks toward |
| महि | धरती | the ground |
| राजत | शोभित हैं | shine beautifully |
| लोचन | नेत्र | eyes |
| लोल | चंचल | restless; moving |
2 खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल।।258।।
मानो कामदेव की दो मछलियाँ खेलती हुई चंद्रमा के मंडल में डोल रही हों।
English explanation
It is as though two fish belonging to the god of love were playfully swimming within the moon’s disk.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| खेलत | खेलते हुए | playing |
| मनसिज | कामदेव की | of the god of love |
| मीन | मछलियाँ | fish |
| जुग | जोड़ा; दो | a pair; two |
| जनु | मानो | as though |
| बिधु | चंद्रमा के | of the moon |
| मंडल | मंडल में | within the disk |
| डोल | डोलती हों | were moving about |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 258
- स्रोत अभिलेख
- 1.258
- सहायक विषय
- श्रीलक्ष्मणजीका क्रोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 249, 250
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