बालकाण्ड · दोहा 37 · दोहा/सोरठा
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।37।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.37 · पुस्तक पृ. 59, 60
भावार्थ और शब्दार्थ
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1पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।
आनंद का रोमांच वाटिकाएँ, बाग और वन है; सुख सुंदर पक्षियों का विहार है।
English explanation
The thrill of joy forms the gardens, orchards, and woods; happiness is the lovely birds’ wandering and play.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुलक | आनंद से रोमांच | the thrill of joy |
| बाटिका | वाटिकाएँ | gardens |
| बाग | बाग | orchards |
| बन | वन | woods |
| सुख | सुख | happiness |
| सुबिहंग | सुंदर पक्षियों का | of lovely birds |
| बिहारु | विहार, घूमना और खेलना | wandering and play |
2 माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।37।।
सुंदर मन माली है; सुंदर नेत्र प्रेमरूपी जल से सिंचाई करते हैं।
English explanation
The noble mind is the gardener; the beautiful eyes water the garden with the water of love.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| माली | माली | gardener |
| सुमन | सुंदर या श्रेष्ठ मन | the noble mind |
| सनेह | प्रेम का | of love |
| जल | जल | water |
| सींचत | सींचते हैं | water or irrigate |
| लोचन | नेत्र | eyes |
| चारु | सुंदर | beautiful |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 37
- स्रोत अभिलेख
- 1.37
- सहायक विषय
- मानसका रूप और माहात्म्य
- मुद्रित पृष्ठ
- 59, 60
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