बालकाण्ड · दोहा 326 · दोहा
पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।
पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।
हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन॥ ३२६॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.326 · पुस्तक पृ. 309, 310
भावार्थ और शब्दार्थ
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1पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।
सीता बार-बार राम को देखती हैं; वे लजाती हैं, पर उनका मन नहीं लजाता।
English explanation
Sita looks at Rama again and again; she feels shy, but her heart knows no shyness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | again |
| पुनि | फिर | again |
| रामहि | राम को | at Rama |
| चितव | देखती हैं | looks |
| सिय | सीता | Sita |
| सकुचति | लजाती हैं | feels shy |
| मनु | मन | heart; mind |
| सकुचै | संकोच करता | feels shy |
| न | नहीं | not |
2हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन॥ ३२६॥
प्रेम के प्यासे उनके मनोहर नेत्र मछलियों की सुंदरता को भी मात देते हैं।
English explanation
Her lovely eyes, thirsting for love, surpass even the beauty of fish.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हरत | मात देते हैं | surpass; eclipse |
| मनोहर | मनोहर | lovely |
| मीन | मछलियों की | of fish |
| छबि | सुंदरता | beauty |
| प्रेम | प्रेम के | for love |
| पिआसे | प्यासे | thirsting |
| नैन | नेत्र | eyes |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा 326
- स्रोत अभिलेख
- 1.326
- सहायक विषय
- श्रीसीता-राम-विवाह
- मुद्रित पृष्ठ
- 309, 310
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