बालकाण्ड · दोहा 56 · दोहा/सोरठा
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु।।56।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.56 · पुस्तक पृ. 76, 77
भावार्थ और शब्दार्थ
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1परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
सती परम पवित्र हैं, इसलिए उन्हें त्यागा नहीं जाता; किंतु उनसे दांपत्य प्रेम करने पर बड़ा पाप होगा।
English explanation
Sati is supremely pure and cannot be forsaken; yet showing conjugal love toward her would be a grave sin.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| परम | अत्यंत; सर्वोच्च रूप से | supremely |
| पुनीत | पवित्र | pure; holy |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकता | can be |
| तजि | त्यागा | forsaken |
| किएँ | करने पर | upon engaging in |
| प्रेम | दांपत्य प्रेम | conjugal love |
| बड़ | बड़ा; गंभीर | great; grave |
| पापु | पाप | sin |
2 प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु।।56।।
महेश प्रकट रूप से कुछ नहीं कहते, पर उनके हृदय में अत्यधिक संताप है।
English explanation
Shiva says nothing openly, but there is great anguish in his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रगटि | खुलकर; प्रकट रूप से | openly; outwardly |
| न | नहीं | not |
| कहत | कहते | says |
| महेसु | महेश; शिव | Shiva, the great Lord |
| कछु | कुछ भी | anything |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| अधिक | बहुत अधिक | great; intense |
| संतापु | भीतरी दुःख; संताप | anguish; distress |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 56
- स्रोत अभिलेख
- 1.56
- सहायक विषय
- सतीका भ्रम, श्रीरामजीका ऐश्वर्य और सतीका खेद
- मुद्रित पृष्ठ
- 76, 77
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