बालकाण्ड · दोहा 172 · दोहा/सोरठा
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत।।172।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.172 · पुस्तक पृ. 174, 175
भावार्थ और शब्दार्थ
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1नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
गुरु को पहचानकर राजा प्रसन्न हुआ, पर भ्रम के वश में रहने से उसे सच्चाई का बोध न हुआ।
English explanation
Recognizing his guru, the king rejoiced, but under delusion he failed to perceive the truth.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नृप | राजा | the king |
| हरषेउ | प्रसन्न हुआ | rejoiced |
| पहिचानि | पहचानकर | recognizing |
| गुरु | गुरु को; अपना मार्गदर्शक | his guru; spiritual guide |
| भ्रम | भ्रम के | of delusion |
| बस | वश में | under the sway |
| रहा | रहा | remained |
| न | नहीं | not |
| चेत | सचेत हुआ; वास्तविकता समझी | became aware; perceived the truth |
2 बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत।।172।।
उसने तुरंत एक लाख श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उनके परिवारों सहित निमंत्रित किया।
English explanation
He immediately invited one hundred thousand worthy Brahmins, together with their families.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरे | निमंत्रित किया | invited |
| तुरत | तुरंत | immediately |
| सत | सौ | one hundred |
| सहस | हजार | thousand |
| बर | श्रेष्ठ | worthy; excellent |
| बिप्र | ब्राह्मण | Brahmins |
| कुटुंब | परिवार | families |
| समेत | सहित | together with |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 172
- स्रोत अभिलेख
- 1.172
- सहायक विषय
- प्रतापभानुकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 174, 175
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