बालकाण्ड · दोहा 156 · दोहा/सोरठा
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु।।156।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.156 · पुस्तक पृ. 161, 162
भावार्थ और शब्दार्थ
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1नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
नीले पर्वत के शिखर जैसा विशाल सूअर देखकर—
English explanation
Seeing the huge boar, like the peak of a dark-blue mountain—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नील | नीले | dark-blue |
| महीधर | पर्वत के | of a mountain |
| सिखर | शिखर | peak |
| सम | के समान | like |
| देखि | देखकर | having seen |
| बिसाल | विशाल | huge |
| बराहु | जंगली सूअर | wild boar |
2 चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु।।156।।
राजा घोड़े को चाबुक लगाकर और हाँककर झट आगे बढ़ा; उस सूअर को छोड़े बिना पीछा करना उसे अनिवार्य लगा।
English explanation
The king hurried forward, whipping and urging his horse; he felt he could not let the boar go unpursued.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चपरि | झटपट | swiftly |
| चलेउ | चल पड़ा | set off |
| हय | घोड़े को | the horse |
| सुटुकि | चाबुक लगाकर | having whipped |
| नृप | राजा | the king |
| हाँकि | हाँककर; आगे दौड़ाकर | urging onward |
| न | नहीं | not |
| होइ | होता | is possible |
| निबाहु | निर्वाह; छोड़कर आगे बढ़ना | getting by; letting it go |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 156
- स्रोत अभिलेख
- 1.156
- सहायक विषय
- प्रतापभानुकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 161, 162
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