बालकाण्ड · दोहा 222 · दोहा/सोरठा
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।
यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि।।222।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.222 · पुस्तक पृ. 219, 219
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।
नहीं तो, हे सखी, सुनो—हमारे लिए इनके दर्शन दुर्लभ हैं।
English explanation
Otherwise, listen, friend: seeing him would be beyond our reach.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाहिं | नहीं | not |
| त | तो | then; otherwise with the preceding word |
| हम | हम | us |
| कहुँ | के लिए | for |
| सुनहु | सुनो | listen |
| सखि | हे सखी | O friend |
| इन्ह | इनके, राम के | him, Rama |
| कर | का | of |
| दरसनु | दर्शन | the sight |
| दूरि | दूर, दुर्लभ | out of reach |
2 यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि।।222।।
यह मिलन तभी होता है जब पहले किए हुए पुण्य बहुत हों।
English explanation
Such a meeting occurs only when one has abundant merit from deeds done in the past.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| यह | यह | this |
| संघटु | मिलन, संयोग | meeting; encounter |
| तब | तभी | only then |
| होइ | होता है | occurs |
| जब | जब | when |
| पुन्य | पुण्य, शुभ कर्मों का संचित फल | merit from good deeds |
| पुराकृत | पहले किए हुए | performed in the past |
| भूरि | बहुत, प्रचुर | abundant |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 222
- स्रोत अभिलेख
- 1.222
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मणका जनकपुर-निरीक्षण
- मुद्रित पृष्ठ
- 219, 219
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