बालकाण्ड · दोहा 241 · दोहा/सोरठा
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.241 · पुस्तक पृ. 235, 235
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।
स्त्रियाँ हृदय में प्रसन्न होकर, अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उनका रूप देखती हैं।
English explanation
The women gaze at them with joy in their hearts, each according to her own inclination.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नारि | स्त्रियाँ | the women |
| बिलोकहिं | देखती हैं | gaze |
| हरषि | प्रसन्न होकर | rejoicing |
| हियँ | हृदय में | in their hearts |
| निज | अपनी | her own |
| निज | अपनी; प्रत्येक की अलग | each one’s own |
| रुचि | रुचि के | inclination |
| अनुरूप | अनुसार | according to |
2 जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।।
मानो शृंगार रस ही अत्यंत अनुपम रूप धारण करके सुशोभित हो रहा हो।
English explanation
It is as though the sentiment of love and beauty itself shines forth, having assumed a supremely matchless form.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जनु | मानो | as though |
| सोहत | सुशोभित हो रहा हो | shines forth |
| सिंगार | शृंगार रस | the sentiment of love and beauty |
| धरि | धारण करके | having assumed |
| मूरति | रूप | a form |
| परम | अत्यंत | supremely |
| अनूप | अनुपम; जिसकी तुलना न हो | matchless |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 241
- स्रोत अभिलेख
- 1.241
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मणसहित विश्वामित्रका यज्ञशालामें प्रवेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 235, 235
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।