बालकाण्ड · दोहा 201 · दोहा/सोरठा
देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड।
देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड।। 201।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.201 · पुस्तक पृ. 200, 201
भावार्थ और शब्दार्थ
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1देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड।
उन्होंने माता को अपना अद्भुत, अखंड रूप दिखाया।
English explanation
He showed his mother his own wondrous, undivided form.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखरावा | दिखाया | showed |
| मातहि | माता को | to his mother |
| निज | अपना | his own |
| अदभुत | अद्भुत; आश्चर्यजनक | wondrous; astonishing |
| रुप | रूप | form |
| अखंड | अखंड; अविभाजित | whole; undivided |
2 रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड।। 201।।
उस रूप के प्रत्येक रोम में करोड़ों-करोड़ ब्रह्मांड विद्यमान दिखाई दिए।
English explanation
In each hair of that form appeared countless millions of universes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रोम | रोम | hair |
| रोम | रोम; हर एक रोम | hair; each individual hair |
| प्रति | प्रत्येक में | in each |
| लागे | विद्यमान दिखाई दिए | appeared present |
| कोटि | करोड़ | ten million |
| कोटि | करोड़; असंख्य करोड़ | ten million; countless millions |
| ब्रह्मंड | ब्रह्मांड; विश्व-समूह | universes; cosmic worlds |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 201
- स्रोत अभिलेख
- 1.201
- सहायक विषय
- श्रीभगवान्का प्राकट्य और बाललीलाका आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 200, 201
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