बालकाण्ड · दोहा 94 · दोहा
जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।
जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।
रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ॥ ९४॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.94 · पुस्तक पृ. 108, 108
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।
जिस नगर में जगदंबा सीता अवतरित हुई हैं, क्या उस नगर का वर्णन किया जा सकता है?
English explanation
Can the city where Sita, the Mother of the world, has taken birth ever be adequately described?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जगदंबा | जगत की माता, यहाँ सीता | Mother of the world, here Sita |
| जहँ | जहाँ | where |
| अवतरी | अवतरित हुईं | took birth; incarnated |
| सो | वह | that |
| पुरु | नगर | city |
| बरनि | वर्णन किया | described |
| कि | क्या | can it?; whether |
| जाइ | जा सकता है | can be |
2रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ॥ ९४॥
वहाँ समृद्धि, सिद्धियाँ, संपत्ति और सुख नित्य नए रूप में बढ़ते रहते हैं।
English explanation
There, prosperity, attainments, wealth, and happiness continually increase in ever-new forms.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रिद्धि | समृद्धि | prosperity |
| सिद्धि | सिद्धियाँ; सफल उपलब्धियाँ | attainments; accomplishments |
| संपत्ति | धन-संपदा | wealth |
| सुख | सुख | happiness; well-being |
| नित | नित्य; प्रतिदिन | continually; daily |
| नूतन | नए-नए | ever-new |
| अधिकाइ | बढ़ते हैं | increase; abound increasingly |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा 94
- स्रोत अभिलेख
- 1.94
- सहायक विषय
- शिवजीकी विचित्र बारात और विवाहकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 108, 108
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।