बालकाण्ड · दोहा 178 (क) · दोहा/सोरठा
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव।।178(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.178 · पुस्तक पृ. 179, 179
भावार्थ और शब्दार्थ
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1खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
अत्यंत गहरा समुद्र खाई की तरह उसके चारों ओर घेरा बनाता था।
English explanation
The exceedingly deep ocean encircled it on all four sides like a moat.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| खाईं | खाई के रूप में | as a moat |
| सिंधु | समुद्र | the ocean |
| गभीर | गहरा | deep |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| चारिहुँ | चारों | all four |
| दिसि | दिशाओं में | on the sides |
| फिरि | घूमकर, घेरते हुए | circling around |
| आव | घेरता है | extends around it |
2 कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव।।178(क)।।
उसका सुदृढ़ परकोटा सोने का और मणियों से जड़ा था; उसकी बनावट का वर्णन नहीं किया जा सकता।
English explanation
Its strong rampart was golden and studded with gems; its workmanship was beyond description.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कनक | सोने का | golden |
| कोट | परकोटा | fortifying wall; rampart |
| मनि | मणियों से | with gems |
| खचित | जड़ा हुआ | inlaid |
| दृढ़ | मजबूत | strong |
| बरनि | वर्णन किया | be described |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकता | can |
| बनाव | बनावट, रचना की शोभा | workmanship and splendor |
| क | दोहा-खंड का संदर्भ-चिह्न ‘क’ | reference marker for verse section ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 178 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 1.178
- सहायक विषय
- रावणादिका जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार
- मुद्रित पृष्ठ
- 179, 179
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।