बालकाण्ड · दोहा 176 · दोहा/सोरठा
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।176।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.176 · पुस्तक पृ. 177, 178
भावार्थ और शब्दार्थ
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1उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
यद्यपि वे पुलस्त्य ऋषि के पवित्र, निर्मल और अनुपम कुल में जन्मे,
English explanation
Although they were born in sage Pulastya’s sacred, stainless, and peerless lineage,
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उपजे | जन्मे | were born |
| जदपि | यद्यपि | although |
| पुलस्त्यकुल | पुलस्त्य ऋषि के कुल में | in sage Pulastya’s lineage |
| पावन | पवित्र | sacred |
| अमल | निर्मल | stainless |
| अनूप | अनुपम | peerless |
2 तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।176।।
तथापि ब्राह्मणों के शाप के वश होकर वे सब पाप के मूर्त रूप हो गए।
English explanation
Nevertheless, under the force of the Brahmins’ curse, they all became embodiments of sin.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तदपि | फिर भी | nevertheless |
| महीसुर | ब्राह्मणों के | the Brahmins’ |
| श्राप | शाप | curse |
| बस | के वश होकर | under the force of |
| भए | हो गए | became |
| सकल | सभी | all |
| अघरूप | पाप के मूर्त रूप | embodiments of sin |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 176
- स्रोत अभिलेख
- 1.176
- सहायक विषय
- रावणादिका जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार
- मुद्रित पृष्ठ
- 177, 178
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