बालकाण्ड · दोहा 161 (क) · दोहा/सोरठा
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु।।161(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 1.161 · पुस्तक पृ. 165, 166
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
अब तक मुझे कोई नहीं मिला, और मैं अपने बारे में किसी को बताता भी नहीं हूँ।
English explanation
Until now, no one has met me, and I do not make myself known to anyone.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अब | अब | now |
| लगि | तक | until |
| मोहि | मुझे | me |
| न | नहीं | not |
| मिलेउ | मिला | has met |
| कोउ | कोई | anyone |
| मैं | मैं | I |
| न | नहीं | not |
| जनावउँ | अपना परिचय देता हूँ | make myself known |
| काहु | किसी को | to anyone |
2 लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु।।161(क)।।
लोक-प्रतिष्ठा आग के समान है; वह तपस्या के वन को जला देती है।
English explanation
Public esteem is like fire: it burns down the forest of ascetic discipline.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लोकमान्यता | समाज में प्रतिष्ठा | public esteem |
| अनल | आग | fire |
| सम | के समान | like |
| कर | करती है | causes |
| तप | तपस्या | ascetic discipline |
| कानन | वन | forest |
| दाहु | दहन | burning |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न (क) | verse reference marker (क) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 161 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 1.161
- सहायक विषय
- प्रतापभानुकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 165, 166
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।