बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी।।
मूल पाठ
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी।।
कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा।।
स्रोत अभिलेख 1.58 · पुस्तक पृ. 78, 79
भावार्थ
मूल पाठ के बादअपनी करनीको याद करके सतीजीके हृदयमें इतना सोच है और इतनी अपार चिन्ता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [उन्होंने समझ लिया कि] शिवजी कृपाके परम अथाह सागर हैं, इससे प्रकटमें उन्होंने मेरा अपराध नहीं कहा॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 78 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी।।
English explanation
AI-draft meaning: Reflecting on her own conduct, Sati feels grief in her heart. Her boundless anxiety cannot be described.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| सोचु | शोक; चिंता | grief; anxiety |
| समुझत | विचार करते हुए | while reflecting on |
| निज | अपनी | her own |
| करनी | करनी; किए हुए कर्म | conduct; deeds |
| चिंता | चिंता | anxiety |
| अमित | असीम | boundless |
| जाइ | जा सकती है | can be |
| नहि | नहीं | not |
| बरनी | वर्णित की | described |
2 कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा।।
English explanation
Shiva, an ocean of compassion, is profoundly unfathomable; he did not openly speak of my wrongdoing.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपासिंधु | कृपा के सागर | ocean of compassion |
| सिव | भगवान शिव | Lord Shiva |
| परम | अत्यंत | supremely |
| अगाधा | अथाह; जिनका भाव समझना कठिन है | unfathomable; difficult to fathom |
| प्रगट | खुलकर | openly |
| न | नहीं | not |
| कहेउ | कहा | said; spoke of |
| मोर | मेरा | my |
| अपराधा | अपराध | wrongdoing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.58
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 78
- सहायक विषय
- शिवजीद्वारा सतीका त्याग, शिवजीकी समाधि
- मुद्रित पृष्ठ
- 78, 79
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।