बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दशिवजीका रुख देखकर सतीजीने जान लिया कि स्वामीने मेरा त्याग कर दिया और वे हृदयमें व्याकुल हो उठीं। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, परन्तु हृदय [भीतर-ही-भीतर] कुम्हारके आँवेके समान अत्यन्त जलने लगा॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 78 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।।
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई।।
स्रोत अभिलेख 1.58 · पुस्तक पृ. 78, 79
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।।
English explanation
Seeing Shankara's demeanor, Bhavani—Sati—grew distressed at heart: ‘My lord has forsaken me.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संकर | शंकर; शिव | Shankara, Shiva |
| रुख | रुख; व्यवहार का भाव | demeanor; attitude |
| अवलोकि | देखकर | having observed |
| भवानी | भवानी; यहाँ सती | Bhavani, here Sati |
| प्रभु | प्रभु; शिव | my lord, Shiva |
| मोहि | मुझे | me |
| तजेउ | त्याग दिया | forsook |
| हृदयँ | हृदय में | at heart |
| अकुलानी | व्याकुल हुईं | became distressed |
2 निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई।।
English explanation
Recognizing her own wrongdoing, Sati cannot say anything. Her heart burns intensely like a potter's kiln.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपना | her own |
| अघ | पाप; अपराध | sin; wrongdoing |
| समुझि | समझकर | having recognized |
| न | नहीं | not |
| कछु | कुछ भी | anything |
| कहि | कहा | said |
| जाई | जा सकता | can be |
| तपइ | तपता है | burns; grows hot |
| अवाँ | कुम्हार का आवा | potter's kiln |
| इव | की तरह | like |
| उर | हृदय | heart |
| अधिकाई | अत्यधिक | intensely |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.58
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 78
- सहायक विषय
- शिवजीद्वारा सतीका त्याग, शिवजीकी समाधि
- मुद्रित पृष्ठ
- 78, 79
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।