बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।।
मूल पाठ
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।।
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।।
स्रोत अभिलेख 1.3 · पुस्तक पृ. 21, 23
भावार्थ
मूल पाठ के बाददुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारसके स्पर्शसे लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है)। किन्तु दैवयोगसे यदि कभी सज्जन कुसंगतिमें पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँपकी मणिके समान अपने गुणोंका ही अनुसरण करते हैं (अर्थात् जिस प्रकार साँपका संसर्ग पाकर भी मणि उसके विषको ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाशको नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टोंके संगमें रहकर भी दूसरोंको प्रकाश ही देते हैं, दुष्टोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता)॥ ५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 22 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।।
English explanation
Even wicked people improve through good company, just as base metal becomes beautiful through the touch of the philosopher’s stone.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सठ | दुष्ट; मूर्ख | wicked or foolish people |
| सुधरहिं | सुधर जाते हैं | are reformed |
| सतसंगति | सज्जनों की संगति | good company |
| पाई | पाकर | having obtained |
| पारस | पारस पत्थर के | of the philosopher’s stone |
| परस | स्पर्श से | through contact |
| कुधात | निकृष्ट धातु | base metal |
| सुहाई | सुंदर हो जाती है | becomes beautiful |
2 बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।।
English explanation
Even if fate places good people in bad company, they remain true to their own qualities, like the jewel of a serpent.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिधि | भाग्य के | of fate |
| बस | वश में | under the sway |
| सुजन | सज्जन | good people |
| कुसंगत | बुरी संगति में | in bad company |
| परहीं | पड़ जाते हैं | fall into |
| फनि | सर्प की | of a serpent |
| मनि | मणि | jewel |
| सम | समान | like |
| निज | अपने | their own |
| गुन | गुणों का | qualities |
| अनुसरहीं | अनुसरण करते हैं | remain true to; follow |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.3
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 22
- सहायक विषय
- ब्राह्मण-संत-वन्दना
- मुद्रित पृष्ठ
- 21, 23
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।