बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।।
मूल पाठ
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।।
प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।।
स्रोत अभिलेख 1.218 · पुस्तक पृ. 215, 216
भावार्थ
मूल पाठ के बादलक्ष्मणजीके हृदयमें विशेष लालसा है कि जाकर जनकपुर देख आवें। परन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका डर है और फिर मुनिसे भी सकुचाते हैं। इसलिये प्रकटमें कुछ नहीं कहते; मन-ही-मन मुसकरा रहे हैं॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 215 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।।
English explanation
Lakshmana deeply wished to go and see Janakpur, then return.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लखन | लक्ष्मण | Lakshmana, Rama’s younger brother |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| लालसा | इच्छा | desire |
| बिसेषी | विशेष प्रबल | particularly strong |
| जाइ | जाकर | having gone |
| जनकपुर | राजा जनक की नगरी | King Janaka’s city |
| आइअ | लौट आएँ | return |
| देखी | देखकर | after seeing it |
2 प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।।
English explanation
Out of apprehension before Lord Rama and diffidence toward the sage, Lakshmana does not speak openly but smiles inwardly.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम का | of Lord Rama |
| भय | भय | apprehension |
| बहुरि | और फिर | and also |
| मुनिहि | मुनि विश्वामित्र के प्रति | toward the sage Vishvamitra |
| सकुचाहीं | संकोच करते हैं | feels diffident |
| प्रगट | खुलकर | openly |
| न | नहीं | not |
| कहहिं | कहते हैं | speaks |
| मनहिं | मन ही मन | inwardly |
| मुसुकाहीं | मुसकराते हैं | smiles |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.218
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 215
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मणको देखकर जनकजीकी प्रेम-मुग्धता
- मुद्रित पृष्ठ
- 215, 216
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।