बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजिनको मनसहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमाको वेद 'नेति कहकर वर्णन करता है और जो [सच्चिदानन्द] तीनों कालोंमें एकरस (सर्वदा और सर्वथा निर्विकार) रहते हैं;॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 324 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।।
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई।।
स्रोत अभिलेख 1.341 · पुस्तक पृ. 324, 324
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।।
English explanation
Whom speech, even together with the mind, cannot comprehend, and whom all who reason by inference cannot grasp through argument.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मन | मन | the mind |
| समेत | सहित | together with |
| जेहि | जिन्हें | whom |
| जान | जान सकती | can comprehend |
| न | नहीं | not |
| बानी | वाणी | speech |
| तरकि | तर्क से समझ | grasp through reasoning |
| न | नहीं | not |
| सकहिं | सकते हैं | are able to |
| सकल | सभी | all |
| अनुमानी | अनुमान से विचार करने वाले | those reasoning by inference |
2 महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई।।
English explanation
Whose greatness the Vedas describe by saying ‘not this, not this,’ and who remains unchanged through past, present, and future.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| महिमा | महिमा | greatness |
| निगमु | वेद | the Vedas |
| नेति | यह नहीं | not this |
| कहि | कहकर | by saying |
| कहई | वर्णन करते हैं | describe |
| जो | जो | who |
| तिहुँ | तीनों | all three |
| काल | कालों में | periods of time |
| एकरस | एक समान | unchanged |
| रहई | रहते हैं | remains |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.341
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 324
- सहायक विषय
- श्रीसीता-राम-विवाह
- मुद्रित पृष्ठ
- 324, 324
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।