बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[और तो कोई समझाकर कहे या नहीं, राजा तो बड़े समझदार और ज्ञानी हैं, उन्हें तो गुरुको समझानेकी चेष्टा करनी चाहिये थी, परन्तु मालूम होता है] राजाका भी सारा सयानापन समाप्त हो गया। हे सखी! विधाताकी गति कुछ जाननेमें नहीं आती [यों कहकर रानी चुप हो रहीं]। तब एक चतुर (रामजीके महत्त्वको जाननेवाली) सखी कोमल वाणीसे बोली—हे रानी! तेजवान्को [देखनेमें छोटा होनेपर भी] छोटा नहीं गिनना चाहिये॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 248 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।।
बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी।।
स्रोत अभिलेख 1.256 · पुस्तक पृ. 248, 249
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।।
English explanation
All the king's good sense has come to an end. Friend, the course of destiny cannot be understood at all.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भूप | राजा जनक की | of King Janaka |
| सयानप | समझदारी | good sense |
| सकल | सारी | all |
| सिरानी | समाप्त हो गई | has come to an end |
| सखि | हे सखी | O friend |
| बिधि | विधाता की | of Providence |
| गति | चाल; कार्य की दिशा | course; workings |
| कछु | कुछ भी | at all |
| जाति | जाती है | can be |
| न | नहीं | not |
| जानी | समझी; जानी | understood; known |
2 बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी।।
English explanation
The discerning companion spoke gently: 'Queen, one endowed with power should not be considered insignificant.'
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बोली | बोली | spoke |
| चतुर | समझदार | discerning |
| सखी | सखी | female companion |
| मृदु | कोमल | gentle |
| बानी | वाणी में | in speech |
| तेजवंत | तेज और सामर्थ्य से संपन्न को | one endowed with power |
| लघु | छोटा; तुच्छ | small; insignificant |
| गनिअ | समझना चाहिए | should be considered |
| न | नहीं | not |
| रानी | हे रानी | O queen |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.256
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 248
- सहायक विषय
- श्रीलक्ष्मणजीका क्रोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 248, 249
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