बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।।
मूल पाठ
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।।
अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई।।
स्रोत अभिलेख 1.245 · पुस्तक पृ. 238, 239
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[इधर उनके रूपको देखकर सबके मनमें यह निश्चय हो गया कि] शिवजीके विशाल धनुषको [जो सम्भव है न टूट सके] बिना तोड़े भी सीताजी श्रीरामचन्द्रजीके ही गलेमें जयमाल डालेंगी (अर्थात् दोनों तरहसे ही हमारी हार होगी और विजय श्रीरामचन्द्रजीके हाथ रहेगी)। [यों सोचकर वे कहने लगे—] हे भाई! ऐसा विचारकर यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने- अपने घर चलो॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 238 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।।
English explanation
Even without the great bow of Shiva being broken, Sita will place the garland upon Rama’s chest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनु | बिना | without |
| भंजेहुँ | तोड़े भी | even being broken |
| भव | शिव का | of Shiva |
| धनुषु | धनुष | bow |
| बिसाला | विशाल | great; immense |
| मेलिहि | डाल देंगी | will place |
| सीय | सीता | Sita |
| राम | राम के | Rama’s |
| उर | वक्ष पर | upon the chest |
| माला | माला | garland |
2 अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई।।
English explanation
Thinking thus, brothers, go home, having lost your glory, prestige, strength, and splendor.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus |
| बिचारि | विचारकर | having considered |
| गवनहु | चले जाओ | go |
| घर | घर | home |
| भाई | हे भाइयो | brothers |
| जसु | यश | glory |
| प्रतापु | प्रताप; प्रभाव | prestige; prowess |
| बलु | बल | strength |
| तेजु | तेज; गौरव | splendor |
| गवाँई | गँवाकर | having lost |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.245
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 238
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मणसहित विश्वामित्रका यज्ञशालामें प्रवेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 238, 239
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