बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।।
मूल पाठ
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।।
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना।।
स्रोत अभिलेख 1.59 · पुस्तक पृ. 79, 80
भावार्थ
मूल पाठ के बादसतीजीके हृदयमें नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दु:ख-समुद्रके पार कब जाऊँगी। मैंने जो श्रीरघुनाथजीका अपमान किया और फिर पतिके वचनोंको झूठ जाना—॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 79 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।।
English explanation
Each day fresh anxiety weighed heavily on Sati’s heart: When shall I cross this ocean of sorrow?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नित | प्रतिदिन | each day |
| नव | नई | fresh |
| सोचु | चिंता | anxiety |
| सतीं | सती के | of Sati, Shiva’s wife |
| उर | हृदय में | in the heart |
| भारा | भारी बोझ | a heavy burden |
| कब | कब | when |
| जैहउँ | मैं जाऊँगी | shall I go |
| दुख | दुःख का | of sorrow |
| सागर | समुद्र | ocean |
| पारा | पार | to the far shore |
2 मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना।।
English explanation
For the insult I offered to Rama, lord of Raghu’s line, and for then treating my husband’s words as false—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैंने | I |
| जो | जो | that which |
| कीन्ह | किया | did |
| रघुपति | रघुवंश के स्वामी राम का | of Rama, lord of Raghu’s line |
| अपमाना | अपमान | insult |
| पुनिपति | फिर पति के | then, my husband’s |
| बचनु | वचन को | words |
| मृषा | असत्य | false |
| करि | मानकर | as |
| जाना | समझा | regarded |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.59
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 79
- सहायक विषय
- शिवजीद्वारा सतीका त्याग, शिवजीकी समाधि
- मुद्रित पृष्ठ
- 79, 80
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।