बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दस्वामीके चरणोंमें नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तपमें ऐसा मन लगा कि शरीरकी सारी सुध बिसर गयी। एक हजार वर्षतक उन्होंने मूल और फल खाये, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 91 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।।
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए।।
स्रोत अभिलेख 1.74 · पुस्तक पृ. 90, 91
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।।
English explanation
Fresh love for Shiva’s feet arose each day. She forgot her body, and her mind became absorbed in austerities.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नित | प्रतिदिन | each day |
| नव | नया | fresh |
| चरन | शिव के चरणों में | for Shiva’s feet |
| उपज | उत्पन्न होता था | arose |
| अनुरागा | प्रेम | loving devotion |
| बिसरी | भूल गई | was forgotten |
| देह | देह की सुध | awareness of the body |
| तपहिं | तपस्या में ही | in austerities alone |
| मनु | मन | the mind |
| लागा | लग गया | became absorbed |
2 संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए।।
English explanation
For a thousand years she ate roots and fruits; then she spent a hundred years eating greens.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संबत | वर्ष | years |
| सहस | एक हजार | a thousand |
| मूल | कंद-मूल | edible roots |
| फल | फल | fruits |
| खाए | खाए | ate |
| सागु | साग | leafy greens |
| खाइ | खाकर | eating |
| सत | सौ | a hundred |
| बरष | वर्ष | years |
| गवाँए | बिताए | spent |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.74
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 91
- सहायक विषय
- पार्वतीका जन्म और तपस्या
- मुद्रित पृष्ठ
- 90, 91
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।