बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दरसीली हो या अत्यन्त फीकी, अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती ? किन्तु जो दूसरेकी रचनाको सुनकर हॢषत होते हैं, ऐसे उत्तम पुरुष जगत्में बहुत नहीं हैं,॥ ६॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 28 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।।
जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 1.8 · पुस्तक पृ. 28, 29
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।।
English explanation
Who does not find their own poetry pleasing, whether it is delightful or utterly dull?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपनी | one’s own |
| कवित | कविता | poetry |
| केहि | किसे | to whom |
| लाग | लगती है | seems |
| न | नहीं | not |
| नीका | अच्छी | pleasing |
| सरस | रसपूर्ण | delightful |
| होउ | हो | may be |
| अथवा | या | or |
| अति | अत्यंत | extremely |
| फीका | नीरस | dull |
2 जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।।
English explanation
There are not many excellent people in the world who rejoice on hearing others’ poetry.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जे | जो | those who |
| पर | दूसरों की | others’ |
| भनिति | कविता | poetry |
| सुनत | सुनकर | on hearing |
| हरषाही | प्रसन्न होते हैं | rejoice |
| ते | वे | those |
| बर | श्रेष्ठ | excellent |
| पुरुष | लोग | people |
| बहुत | बहुत | many |
| जग | संसार में | in the world |
| नाहीं | नहीं हैं | are not |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.8
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 28
- सहायक विषय
- तुलसीदासजीकी दीनता और रामभक्तिमयी कविताकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 28, 29
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।