बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दसीताजीकी शोभा देखकर श्रीरामजीने बड़ा सुख पाया। हृदयमें वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुखसे वचन नहीं निकलते। [वह शोभा ऐसी अनुपम है] मानो ब्रह्माने अपनी सारी निपुणताको मूॢतमान् कर संसारको प्रकट करके दिखा दिया हो॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 225 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा।।
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई।।
स्रोत अभिलेख 1.23 · पुस्तक पृ. 225, 226
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा।।
English explanation
Seeing Sita’s beauty, Rama felt joy; he praised it inwardly, but no word came to his lips.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखि | देखकर | having seen |
| सीय | सीता की | Sita’s |
| सोभा | शोभा, सुंदरता | beauty |
| सुखु | सुख | joy |
| पावा | पाया | experienced |
| हृदयँ | हृदय में | in his heart |
| सराहत | सराहते हुए | praising |
| बचनु | शब्द | a word |
| न | नहीं | not |
| आवा | आया, निकला | came forth |
2 जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई।।
English explanation
It is as though Brahma, by fashioning Sita, has openly displayed all his own artistry to the world.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जनु | मानो | as though |
| बिरंचि | ब्रह्मा, सृष्टिकर्ता | Brahma, the creator |
| सब | सारी | all |
| निज | अपनी | his own |
| निपुनाई | रचना-कुशलता | artistry |
| बिरचि | रचकर | having fashioned |
| बिस्व | संसार | the world |
| कहँ | को | to |
| प्रगटि | प्रकट करके | openly revealing |
| देखाई | दिखा दी | displayed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.23
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 225
- सहायक विषय
- पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजीका प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीका परस्पर दर्शन
- मुद्रित पृष्ठ
- 225, 226
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