बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजिसका घर कल्पवृक्षके नीचे हो, वह भला दरिद्रतासे उत्पन्न दु:खको क्यों सहेगा? हे शशिभूषण! हे नाथ! हृदयमें ऐसा विचारकर मेरी बुद्धिके भारी भ्रमको दूर कीजिये॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 122 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई।।
ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।।
स्रोत अभिलेख 1.108 · पुस्तक पृ. 121, 122
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई।।
English explanation
Can someone whose home is beneath the wish-fulfilling celestial tree suffer misery caused by poverty?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जासु | जिसका | whose |
| भवनु | घर | home |
| सुरतरु | कल्पवृक्ष | wish-fulfilling celestial tree |
| तर | के नीचे | beneath |
| होई | हो | is |
| सहि | सहे | suffer |
| कि | क्या | can; would |
| दरिद्र | दरिद्रता से | by poverty |
| जनित | उत्पन्न | caused |
| दुखु | दुख | misery |
| सोई | वही व्यक्ति | that person |
2 ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।।
English explanation
O Shiva, who wears the moon as an ornament, consider this in your heart and remove the profound confusion in my understanding, O Lord.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ससिभूषन | हे चंद्रभूषण शिव | O Shiva, adorned with the moon |
| अस | ऐसा | thus; this |
| हृदयँ | हृदय में | in your heart |
| बिचारी | विचारकर | having considered |
| हरहु | दूर कीजिए | remove |
| नाथ | हे नाथ | O Lord |
| मम | मेरी | my |
| मति | बुद्धि का | in understanding |
| भ्रम | भ्रम | confusion |
| भारी | भारी | profound |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.108
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 122
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 121, 122
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।