बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी।।
मूल पाठ
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी।।
चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा।।
स्रोत अभिलेख 1.148 · पुस्तक पृ. 155, 155
भावार्थ
मूल पाठ के बादशोभाके समुद्र श्रीहरिके रूपको देखकर मनु-शतरूपा नेत्रोंके पट (पलकें) रोके हुए एकटक (स्तब्ध) रह गये। उस अनुपम रूपको वे आदरसहित देख रहे थे और देखते-देखते अघाते ही न थे॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 155 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी।।
English explanation
Seeing the Lord’s form, an ocean of beauty, Manu and Satarupa gazed steadily without blinking.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| छबिसमुद्र | सुंदरता का समुद्र | ocean of beauty |
| हरि | भगवान का | the Lord’s |
| रूप | स्वरूप | form |
| बिलोकी | देखकर | having seen |
| एकटक | एकटक; बिना दृष्टि हटाए | with an unwavering gaze |
| रहे | रहे | remained |
| नयन | आँखों के | of the eyes |
| पट | कपाट; पलकें | lids |
| रोकी | रोककर; झपकने न देकर | holding still; preventing blinking |
2 चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा।।
English explanation
Manu and Satarupa gaze reverently at that incomparable form, yet never feel they have seen enough.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चितवहिं | देखते हैं | gaze |
| सादर | आदर सहित | reverently |
| रूप | स्वरूप को | at the form |
| अनूपा | अनुपम; जिसका कोई समान नहीं | incomparable |
| तृप्ति | तृप्ति; संतोष | satisfaction |
| न | नहीं | not |
| मानहिं | अनुभव करते हैं | feel |
| मनु | मनु; सतरूपा के पति, आदिपुरुष | Manu, primordial ancestor and Satarupa’s husband |
| सतरूपा | सतरूपा; मनु की पत्नी, आदिमाता | Satarupa, primordial mother and Manu’s wife |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.148
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 155
- सहायक विषय
- मनु-शतरूपा-तप एवं वरदान
- मुद्रित पृष्ठ
- 155, 155
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।